यहोवा प्रभु मेरे, भूमि आकाश में;महिमामय नाम तेरा महान है ।।
1.पल्टा लेनेवाले शत्रु को रोका,प्रभाव ये नन्हों की आराधना का;स्थापित किया है ये दृढ़ गढ़ तू ने,आश्रय.स्थान मैं पाऊँ जिस में ।
2.आकाश और चन्द्रमा और तारागण,हाथों का काम तेरे देखता क्षण क्षण;क्या है मनुष्य कि तू करता स्मरण ?सुधि तू ले उसकी क्या है कारण ?
3.क्योंकि प्रभु तू ने स्वर्गदूतों से,थोड़ा सा ही कम हैं ठहराया उसे;महिमा और प्रताप का मुकुट मगर,पहिनाया है तू ने उस के सिर पर ।
4.आकाश के पक्षी, समुद्री मछलियाँ,जंगल के जानवर और भेड़ें बकरियाँ;पाँव तले उसके, तू सब कुछ किया,कामों पर अपने है अधिकार दिया ।
5.हे यहोवा तू है प्रभु हमारा,कितना प्रतापमय है नाम प्रभु तेरा;दिया है तू हमें स्वरुप तेरा,तेरे ही नाम द्वारा, हल्लेलूयाह ।