(भजन - 46)
शरणस्थान और बल हमारा, संकट में सहाय ... परमेश्वर (2) इस कारण कोई डर नहीं है, उल्टे पृथ्वी भी(2) ... परमेश्वर
1.चाहे सागर गर्जन करे, फेन उठाए,(2) ... और कांपे, पर्वत भी बड़े लहरांे के, बाढ़ से उसके ।(2) ... परमेश्वर
2.एक नदी है नहरों से जिसकी, प्रभु के नगर में,(2) ... परम प्रधान के पवित्र भवन में, होता है आनन्द । ...
3.बीच में है परमेश्वर उसके, वह न टलेगा,(2) ... कभी भी पौ फटते ही ईश्वर उसकी, सहायता करेगा । ...
4.जाति के लोग सब झल्ला उठे है, डगमगाने लगे,(2) ... राज्य सब, यहोवा जब बोल उठा, पिघल गयी पृथ्वी ...
5.सेनाओं का जो यहोवा, संग हमारे है,(2) ... याकूब का, परमेश्वर जो ऊँचा गढ़ वह, बल हमारा है ...
6.यहोवा के महाकर्मो को, आओ हम देखें,(2) ... कि उसने पृथ्वी पर भी कैसे कैसे, काम है किये ...
7.चुप हो जाओ, और यह जानो, मैं हूँ परमेश्वर(2) ... सारे लोग, मैं हूँ महान सारी पृथ्वी में, सारी जातियों पर ...,