(भजन 120)
संकट में मैंने प्रभु से बिनती की ।।(2)
1.और उसने मेरी सून ली...a उत्तर दिया भी जल्दी;झूठे मूँह से तू बचा प्रभु जल्दी ।(2) संकट
2.रक्षा कर छली जीभ से... मैं क्या करुँ छली जीभ से ?देऊँगा तेज तीर झाऊ के अंगारे ।
3.है बसना मेरा मेशेक में... केदार के तम्बुओं में;रहना मेरा है मेल के बैरियों में ।
4.चाहता हूँ मेल मैं उन से... न बातें वे मेरी समझते;बोलते ही मेरे वे मुझ से युद्ध करते ।