‘‘विश्वास, आशा और प्रेम ये तीनों स्थाई है, पर इनमेंसब से बड़ा प्रेम है ।’’ (1 कुरिन्थियों 13:13)
प्रशंसा गाके मैं स्तुति करुँ,राजाओं के राजा को, प्रभुओं के प्रभु को;झुक के मैं प्रणाम करुँ ।।
1.अद्भुत है तेरा यह प्रेम... मुझ पर परमेश्वर दिखाया पवित्र प्रेम;न बदलनेवाला यह प्रेम... रहता है मुझ में यह प्रेम ।
2.ज्योति है जग की यह प्रेम... जीवन में देकर खरीदा है मुझे यह प्रेम;बलिदानवाला यह ख्रिस्त प्रेम... दिव्य और मधुर यह प्रेम ।
3.संसार के प्रेम में खोया... मुझ को सनातन प्रेम से प्रेम किया;मुझे जीता है यह दिव्य प्रेम... दिल में भर आता यह प्रेम ।
4.विश्वास योग्य यह प्रेम... माता जैसे सम्भालता है हर दिन यह प्रेम;महान और ऊँचा है प्रभु प्रेम... मुझे है खींचता यह प्रेम ।
5.शाश्वत है तेरा यह प्रेम... शान्ति देता है दिव्य वचन से यह प्रेम;सामर्थी है यह प्रभु प्रेम... सदा स्थिर रहता यह प्रेम ।