(भजन - 45)
परमेश्वर अपने पवित्र नगर, और पर्वत पर है महान;(2)स्तुति के है वह योग्य अति, यहोवा ही है महान ।।(2)
1.सिय्योन का पर्वत ऊँचा है, और सुन्दर भी है महान;(2)सब जग के हर्ष का कारण है, महाराजा की नगरी महान ।(2)
2.परमेश्वर ही ऊँचा गढ है, उन महलों की वह शान;यह नगर है राजाधिराजा का, उत्तर में स्थित यह जान ।
3.सब राजा मिल के आगे बढ़े, देखा उसको भयमान;लोग विस्मित हो वे घबराएँ, लेके भागे सब प्राण ।
4.कंपकंपी ने उनको धर पकड़ा, और उतर गया अभिमान;जननेहारी सी पीड़ा उठी, और निकल गई सब शान ।
5.पुरवायु चला के तोड़ डाले, तरशीश के सब जलयान;परमेश्वर नगर में जा देखा, जैसा सुना था उसका मान ।
6.तू सदा रखेगा दृढ़ उसको, हे परमेश्वर हे महान;मन्दिर के भीतर हमने किया, तेरी करुणा पर ध्यान ।
7.पृथ्वी के छोर लों फैल गयी, तेरे नाम की स्तुति महान;हस्त दहिना तेरा भरा हुआ, धर्म नीति के प्रमाण ।
8.सिय्योन की तुम परिक्रमा करो, गुम्मट गिन लो गुणवान;और शहरपनाह पर ध्यान करो, लो महलों को सब जान ।
9.तब भावी पीढ़ी के लोगों से, तुम कर सकोगे बयान;सदा यह है हमारा परमेश्वर, मृत्यु तक है अगुवा ।