‘‘परमेश्वर को उस के उस दान के लिये,जो वर्णन से बाहर है, धन्यवाद हो ।’’ (2 कुरिन्थियों 9:15)
मैंने है पाया तुझ से प्रभुजी,सब कुछ है उत्तम जो मुझे दिया ।।
1.जीवन की यात्रा में आज तक चला मैं,पूरे समय मेरा साथ है दिया;एबेनेजेर बनकर तू ही तो प्रभुजी,मेरा सहायक और रक्षक हुआ ।
2.आन्धी तूफानों के बीच से मैं आया,अन्धकार की शक्तियाँ प्रबल जो थी;पंखो में मुझ को छिपाकर प्रभुजी,उत्तम सहारा तू मुझे दिया ।
3.दुःख की घड़ी जब मुझ पर आयी,पास रहकर अपना वह आनन्द दिया;भय और निराशा के समय में प्रभुजी,तू ही मुझे बड़ा हियाव दिया ।
4.मेरे शरीर में काँटा एक आया,शैतान का दूत मुझे घूँसे मारे;निर्बलता, निन्दा और व्याधि, धटी में,तेरा अनुग्रह मुझे दिया ।
5.हूँ मैं आभारी, धन्य मैं हुआ,क्योंकि अनुपम प्रेम तेरा पाया;हरेक परीक्षा और कठिन समय मैं,जयवन्त होना कैसे तू सिखाया ।