‘‘व्यर्थ ही व्यर्थ, व्यर्थ ही व्यर्थ ! सब कुछ व्यर्थ है ।’’(सभोपदेशक 1:2)
व्यर्थ ही व्यर्थ है, सब कुछ व्यर्थ है;नाशमान यह दुनिया, नाश के लिए है ।।
1.बुरे संसार में सब कुछ बुरा है,रंग इसका फीका होता जाता है ।
2.देखो तो कैसा वह भ्रष्ट भी हुआ है,पाप का घड़ा अब तो पूरा भरा है ।
3.चारों तरफ देखों पाप अशुद्धता है,लड़ाई और हिंसा से बिलकुल भरा है ।
4.संसार में सब कुछ मिटता जाता है,यह संसार सचमुच अयोग्य ठहरा है ।
5.व्यर्थ के संसार में न कोई है अपना,स्वार्थ, विरोध और ईर्ष्या से पूर्ण है ।
6.एक दिन परमेश्वर ही, जलाएगा इस को,नाश होगा सब कुछ हमेशा के लिए ।
7.एक राज्य तैयार, धार्मिकता जिस में है,प्रभु की महिमा सदा वास करती है ।
8.जाओगे क्या तुम, उस अद्भुत राज्य में ?पश्चताप करो, मुक्ति यीशु में है ।