(भजन 111:1-7)
स्तुति करो तुम याह की (2), तुम स्तुति करो ।। (2)
1.सीधे लोगों की गोष्ठी और मण्डली में,(2)यहोवा तेरा धन्यवाद (2), मन से मैं करूँगा ।(2)
2.काम यहोवा के कैसे बड़े है,प्रसन्न जो रहते हैं उनसे, करते ध्यान सदा ।
3.काम उसके विभवमय और है प्रतापी,और उसका धर्म सदा तक, बना ही रहेगा ।
4.आश्चर्य कामों का स्मरण करायाअनुग्रहकारी और दयावन्त, तू ही है यहोवा ।
5.अपने डरवैयों को आहार दिया है,वाचा को अपनी सदा तक, स्मरण वह रखेगा ।
6.अपने कामों का प्रताप दिखाया,अपनी प्रजा को देने भाग, अन्यजातियों का ।
7.सच्चाई और न्याय उसके हाथों के काम है;विश्वासयोग्य है उपदेश, सब यहोवा के ।