‘‘मसीह कलीसिया का सिर है ।’’ (इफिसियों 5:23)
1.सारी कलीसिया का एक यीशु ही है आधार,वचन और जल से उस ने दिया इस को आकार;वह उस को खोजने आया कि उस की दुल्हिन हो,और अपना खून बहाया उसे मोल लेने को ।
2.सब देशो से मिल बनी, कलीसिया एक ही है;एक ध्वजा उसके त्राण की, प्रभु एक आश्रय है;एक नाम की स्तुति करती, भोज एक ही वह खाती;एक ही आशा में जीती जो है शोभा उस की ।
3.हो चिंतित लोग देखते हैं कलीसिया का पतन,वह कैसी व्यथित देख के ये झगड़े, फूट, अनबन;पर तौभी संतगण देख यह पुकारते, ‘‘कब तक और ?’’रात दुःख की बीती जाती, आती सुहानि भोर ।
4.विषमता और विरोध की पीड़ा में पडी हुई,छुटकारे की राह देखती, जब शान्ति पूर्ण होगी;वह धन्य दृश्य देख के दुःख सारे भूलेगी,जयवन्त कलीसिया में फिर शान्ति रहेगी ।
5.त्रिएक परमेश्वर के संग उस की संगति है,और उन के साथ जो स्वर्ग में विश्राम अब करते हैं;वे धन्य और पवित्र, हम भी वैसे बनें;और ख्रिस्त के साथ दीनता से युगानुयुग रहें ।