‘‘हे प्रभु हम किस के पास जाएँ अनन्त जीवन की बातें तोतेरे ही पास हैं ।’’ (यूहन्ना 6:68)
प्रभु यीशु के चरणों से भटककर मैं किधर जाऊँ ?(2)
1.मैं हर्षित मन से आता हूँ, हृदय की भेंट लाता हूँ;(2)बीते दिनों में हे प्रभु(2), तू ने मुझ को सम्भाला है ।(2)
2.अनुग्रह का वचन देकर, प्रभु तू ने सम्भाला है;संकट क्लेश में साथी बनकर, प्रभु तू ही ले आया है ।
3.अनुग्रह के सिंहासन से, बिनती प्रभु मेरी सुन ले;हर एक घड़ी और हर पल में, प्रभु भय मानूं तेरा मैं ।
4.प्रभु यीशु मैं आता हूँ, जीवन अर्पण मैं करता हूँ;मेरे जीवन से है प्रभु, सेवा अपनी करा ले तू ।
‘‘मुझ को कोई छुछे हाथ अपना मुँह न दिखाए ।’’(निर्गमन 23:15)
1.क्या मैं खाली हाथ से जाऊँ, अपने प्यारे यीशु पास ?उस की सेवा मैं न करुँ, तो मैं रहूँगा उदास ।क्या मैं खाली हाथ से जाऊँ,अपने प्यारे यीशु पास ?एक भी आत्मा ले न जाऊँ,उस का सेवक हो के खास ?
2.मौत गर भी, मुझ पर आवे, उस से मैं न डरूँगा;लेकिन खाली हाथ गर जाऊँ, ठण्ड़ी साँस मैं भरूँगा ।
3.जितने दिन गंवाया पाप में, अफसोस हूँ, अफसोस कमाल;अब मैं मुंजी के कदम पर, रखता हूँ ये जान-ओ-माल ।
4.ऐ मसीह के विश्वासीयों, ऐ मसीही भाईयो;इस से पहिले मृत्यु आवे, प्राणों को बचाइयो ।