(भजन 37:1-25)
कुड़कुड़ाना न कभी... तू... कुकर्मियों का काम देखकर,डाह न करना कभी... तू... कुटिलता करनेवालों को देखकर;कुड़कुड़ाना न कभी ।।
1.धास की नाई ही... वे सब... झड़ कट जाएँगे,हरी घास की नाई ही... वे सब... मुर्झा जायेंगे ।
2.भरोसा यहोवा... पर रख... और भलाई कर,देश में तू बसा रह... मन को... सच्चाई में कर स्थिर ।
3.यहोवा ही को तू... अपने... सुख का मूल जान,वही पूरा करेगा... तेरे... तन के सारे अरमान ।
4.यहोवा पर ही... तू छोड़... मार्ग की चिन्ता,भरोसा उस पर रख... वही... सफल सब करता ।
5.तेरा धर्म और तेरा... न्याय भी... प्रगट वह करेगा,सन्मुख उसके चुप रह... धीरज से... आसरा रख उसका ।
6.जलजलाहट छोड दे... और तू... क्रोध से रह परे,कुढ़ना नहीं जरा भी... उस से निकलेगा बुरा ।
7.धर्मी के विरोध में... दुष्ट... बुरी युक्ति करता,प्रभु उस पर हँसेगा... क्योंकि... उसका दिन भी आता ।
8.धर्मी के पास हो... यद्यपि... माल बहुत ही कम,दुष्टों के बहुत धन से... वही... होता है उत्तम ।
9.धर्मी जन विपत्ति के... समय... लज्जित न होंगे,अकाल के दिनों भी... वे सब... तृप्त रहेंगे ।
10.मनुष्य की गति को... यहोवा... दृढ़ करता है,और उसके चलन से... वह प्रसन्न रहता है ।
11.यहोवा थामे रहता... सदा... हाथ धर्मी का,इसलिये वह गिरे... तौभी... पड़ा न रहेगा ।
12.धर्मी मनुष्य को... यहोवा... कभी नहीं त्यागा,भीख माँगता वंश... उसका... मैं ने नहीं देखा ।