‘‘मैं ने प्रभु को बहुत ही ऊँचे सिंहासन पर विराजमान देखा ।’’(यशायाह 6:2)
पवित्र प्रभुजी मेरे, स्तुति हो उद्धार के लिए ।।
1.अति ऊँचे स्थान पर प्रभु, सिंहासन पर जो तू है;महान है तेरी महिमा, वर्णन से बाहर वह है ।
2.पाप का कोढ़ी जो मैं था, तू ने की मुझ पर दया;धोकर पाप के दागों को, पवित्र मुझे किया है ।
3.अशुद्ध होठों से मैंने, जीवन कपट से बिताया;धोकर इस दोषी मुँह को, स्तुति का गीत दिया है ।
4.छुटकारे का दाम जो दिया, मैं तेरी स्तुति करूँगा;हे कलवरी के प्रभु, सब से आदर के योग्य है ।
5.आदर मैं तेरा करूँगा, आनन्द से सदा प्रभु;प्रशंसा तेरी करूँगा, सब से तू ही उत्तम है ।
6.आँखों से तुझे देखुँगा, स्वर्ग के दूतों के मघ्य में;उद्धारकर्ता शीघ्र आ, आनन्द से बाट जोहता हूँ ।