‘‘वह सिंहासन पर बैठा था... ।’’ (प्रकाशित 5:7)
हे करुणानिधान तू यीशु महान, सिंहासन पर तू विराजमान ।।
1.पवित्र तू है, सत्य तू है, दाऊद की कुँजी हाथ में तेरे है;खोले हुओं को बन्ध कोई न करता,बन्ध किए को कोई खोल न सकता;... यह है तेरी शान ।
2.सात तारे जिसके दाहिने हाथ में है, सोने की सात दिवटों में फिरता है;प्रथम और अन्तिम जीवित सदा है,दोधारी तलवार हाथ में तेरे है;... यह है तेरा मान ।
3.आँखे तेरी अग्नि की ज्वाला है, पाँव उत्तम पीतल के समान है;आत्मा ईश्वर की पास जिसके है,पुस्तक खोलने में जयवन्त तू ही है,... धन्य धन्य प्रधान ।
4.जो आमीन और विश्वासयोग्य है, सच्चा गवाह और सृष्टि का मूल है;भस्मकारी आग और न्यायी तू है,धीरज धरता सामर्थी तू है,... तू है सबसे महान ।
5.भजते प्रभुजी तुझको हम मिलकर, दण्डवत करते आभारी होकर;बड़े सामर्थी काम किए है,समझ से बाहर प्रभु तू है,... करते हैं आदर मान ।