‘‘अद्वेत परमेश्वर हमारे उद्धारकर्ता की महिमा...युगानुयुग रहे ।’’ (यहुदा 25)
वन्दन है, वन्दन हे यीशु;वन्दन तुझ को हमारा, हे यह वन्दन तुझ को हमारा ।
1.आया जग में मानव देह में, मानव जाति को मुुक्ति दिलाने;मृत्यु सहा, मृत्युंजय हुआ, महामहिमा का राजा;तुझ को वन्दन है यह हमारा ।
2.पापी को देखा, प्रेम दिखाया, करुणा से कलवरी पास ले आया;प्रेम से लाया, प्रेम से धोया, प्रेम से आँसू निवारा;अनुपम, प्रेम इस जग में तेरा ।
3.तारण करने, देहधारी हुआ, क्रूस के मरण को अर्पण हुआ;करुणा कर कंगाल को बुलाया, मार्ग दिखाया स्वर्ग का;तुझ को, हृदयार्पण हो सबका ।
4.अनाथ था मैं, तू मेरा नाथ है, तू मेरी चट्टान, तू मेरा आश्रय;अन्धा मैं, मेरे अन्तरंग में, ज्योति दिखाकर चलाता;प्रभुजी, स्तुतियोग्य है तू त्राता ।
5.जग को छोड़ा, स्वर्ग में लौटा, परमपिता की प्रतिज्ञा भेजा;पवित्र आत्मा का वरदान हम पर, प्रलय जैसे उतारा;राजा, स्तुतियज्ञ तुझ को हमारा ।
6.आएगा स्वर्ग से साथ संतो के, स्वर्गीय पिता की पूर्ण महिमा में;प्रमापमय प्रभु प्रगट होगा, अक्षय देह मुझे देगा;प्रणाम, युग युग तुझ को करूँगा ।
7.स्तुति-सिंहासन पर आसीन है, परम-पावन पार वर्णन के;तेजोमय विभव में रहता, महिमित मुक्तिदाता;तुझ को, वन्दन है हे विधाता ।