‘‘उसके पुत्र यीशु का लोहू हमें सब पापों से शुद्ध करता है ।’’ (1 यूहन्ना 1:7)
अमूल्य लोहू से बचे हुए जन,प्रतापमय ईश्वर की है सन्तान;प्रभु का भजन गाओं सन्तगण,आदर, महिमा, स्तुति, जयगान;(2)प्रभु का भजन गाओ सन्तगण ।।
1.बीत रहा था यह जीवन, कुमार्ग से मेरा यह तन;कहता था मैं कुवचन, था नहीं मन में शान्ति और चैन ।
2.चलता था मैं चाकल पथ में, जिसके अन्त में था मरण;नरक के दण्ड को अपनाकर, कमाई करता था पाप का धन ।
3.जीवित सत्य ईश्वर का, लेता नहीं था उसका नाम;दुनिया के धर्म-कर्म से, जाना चाहता था स्वग-धाम ।
4.असीम करुणा के कारण, किया मानव रुप धारण;देकर क्रूस पर अमूल्य प्राण, किया हमारा पूर्ण तारण ।
5.पवित्र लोहू की धारा में, शुद्ध हुआ मैं अब पापी जन;खोला जो आत्मिक यह नयन, भर दिया प्रभुने स्वर्गीय ज्ञान ।
6.अधर्मी, दुष्ट मनुष्य से, किया जो अद्भुत प्रेम महान;उस महान प्रेम के बदले में, चढ़ाता हूँ प्रभु बलिदान ।
7.करता हूँ स्तुति अब तारणहार, आशीषित होकर नम्र मन;आत्मा, प्राण और यह शरीर, करता हूँ प्रभुजी अब अर्पण ।