‘‘इत्र की सुगन्ध से घर सुगन्धित हो गया ।’’ (यूहन्ना 12:3)
आराधना करुँ मैं दिल से भजूँगा,सनातन तक तेरी स्तुति करूँगा ।।मार्ग तू ही है, सत्य तू ही है,जीवन तू ही, मेरे प्रभु ।।
1.क्योंकि मैंने बहुत ही कामों से, तेरी संगति को बिलकुल छोड़ा;(2)मेरे जीवन को तू ने सुधारा,(2) सेवा करना सिखाया प्रभु ।
2.मैं ने सोचा था मेरे जीवन में काफी है तेरा वचन सुनना;पर तू ने मेरे आँसुओं से, पावों को धोना सिखाया प्रभु ।
3.व्यर्थ मैं खोया सब कुछ अपना, स्वार्थ में जीवन मेरा बीता;जब मैं ने तेरे बलिदान को जाना, नम्र होकर पास आया प्रभु ।
4.अपने लहु से धोया मुझे तू, और तू ने मुझ को पवित्र किया;तेरे उद्धार के लिए भजूँगा, हरदम स्तुति करुँ मैं प्रभु ।
5.संसार में मेरा दुर्गन्ध-जीवन था, प्रेम से तू ने मुझे निकट बुलाया;और तू ने मुझको स्वर्गीय भोजन दिया, आनन्दित मुझको किया प्रभु ।
6.भजूँगा तुझे मैं सुगन्धित इत्र से, छिपाकर रखा था वह पात्र तोड़ा;नापा नहीं जाता प्रभु तेरे प्रेम को, मेरे जीवन में काफी तू प्रभु ।
7.प्राचीन, सन्त और आदर के दूत भी, सामने तेरे यदि खड़े भी हो;अनगिनित लोगों के मध्य में मुझे तू, पहचान लेगा प्यारे प्रभु ।