‘‘आनन्द, जो वर्णन से बाहर और महिमा से भरा हुआ है ।’’(1 पतरस 1:8)
दया, अनुग्रह का प्रभु हमारा, धन्यवाद मैं अर्पण करुँ ।।
1.यहोवा की सभी भलाईयों के लिये, भला उसे मैं क्या दे सकता हूँ ?प्याला उद्धार का लेकर, प्रभु के नाम ही से, प्रार्थना अब मैं करुँ ।
2.पूरी करूँगा मैं मन्न्ातें उसकी दास यहोवा का मैं हूँ अब जो;तेरे लोगों के मध्य में, यरूशलेम में सदा, स्तुति प्रशंसा करुँ ।
3.रचे जाने से पहले माँ के गर्भ ही में, तू ने मुझ पर जो चित लगाया;उत्पन्न होने से पहले तू ने मुझे जाना, और अभिषेक किया ।
4.पूरे मन से खोजो मुझे तुम निश्चय, पाओगे तू ने कहा था प्रभु;ढूंढ़ा मुझे तू ने बड़ी करुणा से और मुझे बचाया ।
5.निन्दक मैं था, सतानेवाला भी, अन्धेरकर्ता और अधर्मी भी;दास अपना तू मुझे बनाया, दोषों को मिटा दिया ।
6.देह मेरी ये तोड़ी गई है, प्रेमी प्रभुजी यह कहा तू ने;लोहू जो तेरा बह गया था, पापों की क्षमा के लिए ।
7.अनुग्रह ही से बचाया मुझ को, कार्य अद्भुत यह तेरा ही था;न मेरे कर्मो से न कोई पुण्य भी, प्रभु का वरदान यह था ।
8.वर्णन से बाहर, महिमित वह आनन्द, तू ने मुझ को दिया है प्रभु;सदा खुश रहकर, धन्यवाद देकर, हल्लेलूयाह गाऊँगा ।