‘‘वे तेरे भवन के चिकने भोजन से तृप्त होंगे ।’’ (भजन 36:8)
प्रभु यीशु तू सब में सब कुछ है,मित्रता हमारी जग में सदा है ।।
1.तृप्ति तेरे मन्दिर में जो सदा है,आनन्द का प्रवाह चमका जो उस में;अद्भुत जीवन का सोता है जो तुझ में,आराधना के योग्य है, तू ही ।
2.बहुतायत का प्रेम तेरा मैं जो पाकर भी,पहिले प्रेम को प्रभु मैंने जो छोड़ा;भले प्रभु, कर क्षमा, दे पहिला प्रेम,स्तुति के योग्य सदा तू है, प्रभु ।
3.मेरे विचार, दृष्टि, शब्द और चलन;चाहे बैठूँ या उठूँ और जो देखुँ;सब बातों में मसीह को प्रसन्न करूँगा,रहूँ जहाँ, किसी हालत में, कहीं भी ।
4.पवित्र है, ईश्वरीय स्वभाव,पवित्र जीवन ही हमारा भाग है;पुत्र की तरह सुधारता वह हमें,राज्य तू कर, हम पर प्रभु, राजा ।
5.भाईचारे कि प्रीति और एकता के साथ,दीनता, आनन्द, भक्ति और नम्रता से;अद्भुत हमारे सुगन्धित स्तुति से,नम्र होकर स्तुति तेरी करेंगे ।