‘‘मेरा हृदय उमण्ड रहा है... ।’’ (भजन 45:1)
प्रभुजी तेरे बारेे में अब... मेरा हृदय उमण्ड रहा है ।।
1.तेरे नाम को मैं आदर देकर... और तुझ को मैं भजूँगा;और बड़ाई करूँगा मैं अब... अनुग्रह मुझे दिया है ।
2.निर्जल भूमि में अंकुर की नाई... बहुत क्लेष तू ने उठाया;और दुःखी पुरुष तू हुआ है... मेरा दण्ड तू ने उठाया है ।
3.गोरा तू है और लाल भी है... मेरा प्रीतम तू प्रभुजी;दस हजारों में उत्तम है तू... मेरा परम पिता तू है ।
4.मेम्ने की शादी के भोज के समय... राजाओं के राजा के रुप को;हमेशा देखने के लिए अब... बाट जोहता रहूँगा मैं ।