(भजन 90;1-7)
1.हे प्रभु तू ही पीढी पीढी से... धाम हमारा सदा बना है;युगों-युगों से तू ही हमारा... ईश्वर है, ईश्वर है, ईश्वर है, ईश्वर है ।
2.पहाड़ उत्पन्न होने से पहले... जगत और पृथ्वी रचने से पहले;अनादि काल से अनन्त काल तक...तू ही है, तू ही है, तू ही है, तू ही है ।
3.मनुष्यों को मिट्टी में मिलाता... ‘‘हे मनुष्यों लौट आओ’’ कहता;हजार वर्ष प्रभु तेरी दृष्टि में...क्षणभर है, क्षणभर है, क्षणभर है, क्षणभर है ।
4.हजार वर्ष प्रभु तेरी नजर में... ऐसे जैसे कल का दिन है;रात्रि के एक पहर समान वह...तुझ को है, तुझ को है, तुझ को है, तुझ को है ।
5.मनुष्यों को धारा में बहाता... स्वप्न जैसा उन्हें ठहराता;भोर की बढ़ती घास समान वे...होते हैं, होते हैं, होते हैं, होते हैं ।
6.भोर की घास है उगती, बढती,... सांझ तक कटकर मुरझा जाती;ऐसे ही हम तेरे क्रोध से...नाश हुए, नाश हुए, नाश हुए, नाश हुए ।
7.क्योंकि प्रभु तेरे क्रोध से,... नाश हुए हम देखो कैसे;तेरी जलजलाहट ही से... घबराए, घबराए, घबराए, घबराए ।