‘‘अपनी भलाई से भरे वर्ष पर तूने मानो मुकुट धर दिया है ।’’ (भजन 65:11)
स्तुति हो स्तुति प्रभु, आ आतेरी स्तुति हो स्तुति प्रभु;पुतली की नाई बीते वर्ष में तू,मित्र सा मुझ को सम्भाला तू, स्तुति हो स्तुति प्रभु ।
1.कितनी बड़ी विपत्ति, मेरे डेरे के निकट आए तौभी;पास मेरे वह न आएगी कभी, सम्भाला मुझ को तू ही ।स्तुति हो स्तुति प्रभु ।
2.जब भी कभी मैं गिरा, हर समय मुझ को उठाया;पूरे वर्ष में सम्भाला मुझे तू, सम्भालेगा नये वर्ष में भी तू ।
3.आनन्द ही आनन्द है, आरम्भ में इस नये वर्ष के;उद्धार करने तू आया जगत में, आएगा फिर से प्रभु तू ।
4.नूतन वर्ष में मेरी, जरुरतें तू, जानता सारी;कृपा मुझ पर प्रभु सदा है तेरी, अद्भुत तू ही है प्रभु ।
5.संसार में जब तक मैं हूँ, तेरे आनन्द से भरपूर रहूँ;साथ तेरे रहूँ, पीछे तेरे चलूँ, प्रेमानुग्रहकारी तू है प्रभु ।
6.रहूँ मैं जिस देश में, देखूँ प्रभु निर्दोष उसे मैं;होशन्ना सब के साथ गाऊँ प्रभु मैं, दासों को अपनी कृपा दे तू ।
7.हल्लेलूयाह मैं गाऊँ, सदा सन्तों के साथ मैं हर्षित रहूँ;सुसमाचार चारों तरफ फैलाऊँ, ऐसी ही आशीष मुझे दे तू ।