‘‘हे प्रभु, कह, क्योंकि तेरा दास सुन रहा है ।’’(1 शमूएल 3:10)
बोल यहोवा सुनता तेरा दास, वाणी अब तू सुना दे;वचन अब तेरा सिखा दे, उस पर चलना मुझको दिखा दे ।।
1.भोर को मैं उठता, तेरी वाणी सुनता, क्या ही मधुर उत्तम है;दिन भर के लिये तैयार मुझे करती, हर ठोकर से तू बचा दे ।
2.वचन जब पढ़ता, आवाज तेरी सुनता, अपने आप को मैं जाँचता;तब मैं जान जाता, मार्ग यही है, अब मुझे चलना सिखा दे ।
3.आन्धियाँ उठती जब डर मन में आता, तू मुझ से प्रेम से कहता;मत डर मेरे दास, मैं तेरे संग हूँ, अब यह भेद मुझे बता दे ।
4.आवाज जब तेरी स्पष्टता से सुनता, मेरे लिए तू कहता;करुँ सब ठीक-ठाक, मनुष्य और तुझ से, वचन मानना तू समझा दे ।
5.तेरा वचन जो हथौड़ा और अग्नि, तेज तलवार की नाई है;दर्पण वह अद्भुत मेरे लिये है, असली रूप मेरा दिखा दे ।
6.दुःख मुझ पर आया, वचन तब मैं सीखा, और उससे जीवन पाया;रख मुझे विश्वस्त, मानूं आज्ञा सब, वचन में रहना सिखा दे ।
7.तेरा वचन मुझे कांटता और छांटता, मनुष्य बनाता वह है;अपनी शक्ल में मुझ को तू ढालकर, महिमा तू अपनी करा दे ।