‘‘मैंने स्वर्ग के विरोध मेंऔर तेरी दृष्टि में पाप किया है ।’’(लूका 15:18)
दयालु यीशु, पापी का आश्रय;द्रोही हूँ, मुझ पर दया तू कर ।।
1.हे प्रभु मैं ने तेरा विरोध किया, पाप किया और दुष्टता भी किया;नीच होकर मैं तुझे दुखित किया,हे नाथ ! मैं पापी हूँ, माफ अब तू कर ।
2.संसार का लालच मुझे ललचाया, मेरा शरीर ऐसा भ्रष्ट हो गया;मेरा आश्रय तू ही है प्रभुजी,हे नाथ ! मैं पापी हूँ, माफ अब तू कर ।
3.मेरा धन, दौलत और आदर जो कुछ, हे प्रभु पाप में सब मैं खो दिया;हे प्रभु, मैं बिलकुल खाली अब हूँ,मेरे अपराधों को क्षमा तू कर ।
4.पराए जो थे वह बन गए अपना, और मित्रताई तो सब ने किया;आड़े समय में ये मुझ को छोड़े,हे पिता ! आश्रय दे सहायता अब कर ।
5.छुपे हुए मेरे पाप के लिए, नरक के योग्य मैं अब सचमुच बना;तेरे लोहू से तू धो दे मुझे,यीशुजी ! तेरे बिना मेरा कौन ?
6.अब से तेरी आज्ञा मैं मानूंगा, और तुझ को कभी भी न छोडूंगा;मेरा नाम जीवन की पुस्तक मैं लिख,सम्पूर्ण रीति से निश्चयता दे ।