‘‘मैं मुण्डे टीलों से भी नदियाँ बहाऊँगा ।’’(यशायाह 41:18)
प्रभु नदियाँ बहायेगा, निर्जल, ऊँचे पर्वतों से;प्रभु नदियाँ बहायेगा ।।
1.मरुभूमि करे घना जंगल सा, प्यासी भूमि को अदन सा;महान प्रभु तू बनाने वाला, बदल दे प्रभु हृदय मेरा ।(2)
2.सुखि धाटियों को भी तू ने, भर दिया प्रभु जीवन-जल से;प्रभु, तू है सनातन-चट्टान, भर दे मुझे भी उसी जल से ।
3.नदी के तीर के जीवन-वृक्ष सा, जिसके पत्ते है चंगा करते;रख सम्भालकर दाहिने हाथ से, जाति-जाति के बीच में मुझे ।
4.शान्ति रहित हूँ, सामर्थ्यहीन भी, पर तू है प्रभु अनन्त उत्साह का;बहा दे नदी पीशोन और गीहोन, उजाड़ मेरे इस जीवन से ।
5.हूँ प्रभु मैं नालायक, फलहीन, जर्जर, संकीर्ण हूँ दिल का;बहा दे नदी हिद्दकेल, फरात, निरर्थक मेरे जीवन से ।
6.हूँ निकम्मा योग्य मृत्यु के, तौभी उस वृक्ष की नाई बना;जो हर महीने फलता रहता, अपने सीमाहीन कृपानुसार ।