‘‘कलीसिया जो उसकी देह है और उस की परिपूर्णता है,जो सब में सब कुछ पूर्ण करता है ।’’(इफिसियों 1:22,23)
भक्तों की मण्डली है प्रभु की देह,(2)भरपूरी अपनी जिस में वह भर दे ।।(2)
1.एक देह के बहुत सिर नहीं होते,(2)देह के प्रभुजी सिर है अकेले ।(2) भक्तों
2.खयाल प्रभु के सिर से निकलते,देह में वे आके प्रगट होते ।
3.इस देह में कोई यहुदी न होते,दास न होते, स्वतन्त्र न होते ।
4.इस देह के भिन्न-भिन्न अंग चाहे होते,एक साथ गठ के साथ ही रहते ।
5.हाथ तो पांव से कह नहीं सकते,‘‘तुम बिन हम तो कार्य कर सकते ।’’
6.आत्मिक एकता अंग जब रखते,आत्मिक उन्न्ाति देह में वे लाते ।
7.आधीन सिर के अंग जब रहते,भरपूरी प्रभु की सेवा में पाते ।