‘‘तुम भी आप जीवते पत्थरों की नाई आत्मिक घरबनते जाते हो ।’’ (1 पतरस 2:5)
आत्मिक घर है, प्रभु जो बनाता, आत्मिक नियम से है बनता ।।
1.मन्दिर का दर्शन आत्मा को देकर, आत्मा के द्वारा प्रगट करता ।
2.आत्मा और जीवन से घर है बनता, भरपूर जीवन से दृढ़ करता ।
3.आत्मिक एकता से घर है बनाता, आत्मा से जब वो है भरता ।
4.आत्मिक सेवक और आत्मिक सेवा, आत्मा मन्दिर में प्रभु चाहता ।
5.आत्मिक बलिदान अर्पण होता, तब प्रभु का मन तृप्त होता ।
6.आत्मिक घर में देह और संसार, इन के कामों को स्थान नहीं ।
7.आत्मिक घर में जब ये सब रहता, जगत जीवन से भर जाता ।