‘‘धन्य है वे जो मन के दीन है, क्योंकि स्वर्ग का राज्यउन्हीं का है ।’’ (मत्ती 5:1-12)
1.धन्य हैं वे जो,... मन के दीन हैं;क्योंकि स्वर्ग का राज्य,... उन्हीं का हैं;धन्य हैं वे जो,... शोक करते हैं;क्योंकि वे शान्ति भी,... पाएँगे ।
2.धन्य हैं वे जो,... नम्र हैं;क्योंकि वे पृथ्वी के,... अधिकारी होंगे;धन्य हैं जो धर्म के,... भूखे प्यासे हैं;क्योंकि वे तृप्त,... किये जायेंगे ।
3.धन्य हैं वे जो... दयावन्त हैं;क्योंकि उन पर दया,... की जायेगी;धन्य हैं जिन के,... मन शुद्ध हैं;क्योंकि वे परमेश्वर,... को देखेंगे ।
4.धन्य हैं वे जो,... मेल कराते हैं;क्योंकि वे प्रभु के,... पुत्र ठहरेंगे;धन्य है धर्म के कारण,... सताए जाते जो;क्योंकि स्वर्ग का राज्य,... उन्हीं का है ।
5.धन्य हो मेरे नाम की,... निन्दा सहते जो;स्वर्ग में तुम्हारा,... फल बड़ा है;इसीलिए उन्होंने,...इन नबियों को जो;तुम से पहले सताया था ।