‘‘हे इस्राएल, तू क्या ही धन्य है ।’’(व्यवस्थाविवरण 33:29)
धन्य तू है, सदा धन्य तू है;हे इस्राएल क्या ही धन्य तू है,यहोवा ने तुझे छुड़ाया है;उसकी प्रजा तू तो अनुपम है ।।
1.धन्य तू है तेरे पाप ढँप गए,अपराधों की माफी दाग मिट गए;यहोवा उस का अब लेखा न ले,आत्मा में जिस की कपट नहीं है ।
2.धन्य तू है, तू तो चुना गया है;चुनकर प्रभुजी तुझे निकट लाया है,आँगन में आए, उस के भवन में रहे;मन्दिर के पदार्थो से तृप्त वह है ।
3.धन्य तू है न चले दुष्टों में,पापीयों के मार्ग में न खड़ा रहे;बैठता नहीं ठट्ठा करने वालों में,प्रभु के वचन में प्रसन्न होता है ।
4.धन्य तू है, शक्ति उस में पाता है;हृदय में सिय्योन का मार्ग जो बना हैै,यात्रा में तराईयाँ जब आएँ;जीवन का सोता जो बन जाता है ।
5.धन्य तू है उस की शरण लेता है,चखकर देखो प्रभु कैसा भला है;झुक जा प्रभुजी के चरणों में,अन्त तक सम्भाले वह विश्वासयोग्य है ।