‘‘यहोवा संकट के समय में ऊँचा गढ़ है ।’’ ( भजन 9:9)
1.यीशु, मेरे प्राण के मीत,... जब तक जग में रहता हूँ;दुःख निरन्तर आते है,... तेरी शरण आता हूँ ।जब तक आंधी चलती हो,... मुझ को अपने में छिपा;अन्त में मेरी आत्मा को,... अपने पास विश्राम दिला ।
2.और कोई शरण नहीं,... प्राणों का तू ही आधार;मुझको तू कभी न छोड़,... दे सहारा, ले उबार;तुझ पर ही मेरा विश्वास,... तू ही एक सहायक है;अपने पंखो में छिपा,... मैं निर्बल, तू बलवन्त है ।
3.केवल तुझको चाहता हूँ,... तुझ में ही सब पाया है;मैं पतित ठूकराया हुआ हूँ,... तू ही शुद्ध कर सकता है ।नाम तेरा पवित्र है,... मैं निरा अधर्मी हूँ;तू अनुग्रह-सागर है,... मैं पापों से घिरा हूँ ।
4.मेरे पाप को ढ़ापने का,... तू अनुग्रह सागर है;निर्मल धारा बहने दे,... जीस से मन शुद्ध होता है ।तू ही सोता जीवन का,... मेरे हृदय में तू बह;कि कभी न प्यास लगे,... तू सदा यूँ बहता रह ।