‘‘हम एक नया आकाश और नयी पृथ्वी की आस देखते है,जिन में धार्मिकता वास करेगी ।’’ (2 पतरस 3:13)
आओ चलें, हम मिलकर चलें,उत्तम उस देश में हमें जाना है;जहाँ धार्मिकता वास करती है ।।
1.आओ हमें अब डरना है, यात्री हैं यह हमें जानना है;विश्राम में हम को प्रवेश करना है, यदि भूलें तब रहित होना है ।
2.आओ हमें परिश्रम करना है, आज्ञाएँ प्रभु की सब मानना है;विश्वासयोग्य अन्त तक हमें रहना है, अविश्वासी होकर न गिरें ।
3.आओ दृढ़ता से हम थामे रहें, जो कुछ प्रभु ने हमें सोंपा है;दुष्ट के हथियार से हमें बचना है, कोई मुकुट हमारा न ले ।
4.आओ हरेक बाधा को हटाएँ, उलझाने वाले पाप को दूर करें;दौड़ना है हम को धीरज से दौड़े, क्योंकि हमें वहाँ जाना है ।
5.आओ अब सिद्धता की ओर हम बढ़े, पूरा बलिदान हमें करना है;शोक, दुःख, निन्दा, झूठा दोष सहना है, फल अन्त में पाना है ।